सरदार वल्लभ भाई पटेल की 69वीं पुण्यतिथि पर श्रृध्दांजलि, लेखक- सैयद शहनशाह हैदर आब्दी

सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को हुआ था। सरदार पटेल एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तथा आज़ाद भारत के पहले गृहमंत्री थे। स्वतंत्रता की लड़ाई में उनका महत्वपूर्ण योगदान है।

31 अक्टूबर 1875 गुजरात के नाडियाद के करमसद गांव में सरदार पटेल का जन्म एक किसान परिवार में हुआ था। उन के पिता का नाम झवेरभाई और माता का नाम लाडबा देवी था। सरदार पटेल अपने तीन भाई बहनों में सबसे छोटे और चौथे नंबर पर थे।

शिक्षा :सरदार वल्लभ भाई पटेल की शिक्षा का प्रमुख स्त्रोत स्वाध्याय था। उन्होंने लंदन से बैरिस्टर की पढ़ाई की और उसके बाद पुन: हिंदुस्तान आकर अहमदाबाद में वकालत शुरू की।

स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी : सरदार पटेल ने महात्मा गांधी से प्रेरित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था। सरदार पटेल द्वारा इस लड़ाई में अपना पहला योगदान खेड़ा संघर्ष में दिया गया, जब खेड़ा क्षेत्र सूखे की चपेट में था और वहां के किसानों ने अंग्रेज़ सरकार से कर में छूट देने की मांग की। जब अंग्रेज़ सरकार ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया, तो सरदार पटेल, महात्मा गांधी और अन्य लोगों ने किसानों का नेतृत्व किया और उन्हें कर न देने के लिए प्ररित किया। अंत में सरकार को झुकना पड़ा और किसानों को कर में राहत दे दी गई।

सरदार पटेल नाम यूं पड़ा : सरदार पटेल को सरदार नाम, बारडोली सत्याग्रह के बाद मिला, जब बारडोली कस्बे में सशक्त सत्याग्रह करने के लिए उन्हें पहले बारडोली का सरदार कहा गया। बाद में सरदार उनके नाम के साथ ही जुड़ गया।

योगदान : आज़ादी के बाद ज़्यादातर प्रांतीय समितियां सरदार पटेल के पक्ष में थीं। गांधी जी की इच्छा थी, इसलिए सरदार पटेल ने ख़ुद को प्रधानमंत्री पद की दौड़ से दूर रखा और जवाहर लाल नेहरू को समर्थन दिया। बाद में उन्हें उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री का पद सौंपा गया, जिसके बाद उनकी पहली प्राथमिकता देसी रियासतों को हिंदुस्तान में शामिल करना था। इस कार्य को उन्होंने बग़ैर किसी बड़े लड़ाई झगड़े के बख़ूबी किया। परंतु हैदराबाद के ऑपरेशन पोलो के लिए सेना भेजनी पड़ी।

चूंकि भारत के एकीकरण में सरदार पटेल का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था, इसलिए उन्हें भारत का लौह पुरूष कहा गया।

सरदार पटेल जीवन पर्यन्त कांग्रेसी रहे ,किन्तु आज वे कांग्रेस को देश की बर्बादी और दुर्दशा ,के लिए ज़िम्मेदार कांग्रेस को मानने वाले सत्ताधारी दल और कांग्रेस मुक्त भारत का नारा लगाने वाली भाजपा के आंख के तारे हैं । कल तक पटेल जी कट्टर आलोचक, आज राजनैतिक लाभ की दृष्टि से सरदार पटेल को महिमा मंडित करना और नेहरूजी और गांधीजी को खलनायक सिद्ध करने के लिए सरदार पटेल को अस्त्र के रूप में प्रयोग करने कर रहे हैं |

इसके लिए तथ्य हीन आरोप भी गांधीजी और नेहरूजी पर आरोपित किये जाते हैं | आरोपों में प्रमुख आरोप यह है ,कि गांधीजी ने सरदार पटेल को प्रधान मंत्री नहीं बनने दिया | सरदार पटेल ने सितम्बर १९४६ में नेहरू मंत्रिमंडल में गृहमंत्री का पदभार संभाला था | उनकी मृत्यु दिसम्बर १९५० में हो गयी थी | उनका कार्यकाल गृहमंत्री के रूप में मात्र साढ़े तीन साल रहा । उसमें भी ढाई साल वे अस्पताल के बेड से गृहमंत्रालय का कार्य संचालित करते रहे |

सरदार पटेल का स्वास्थ्य अत्यधिक ख़राब उनकी बार ,बार की गिरफ्तारी के कारण हो गया था | उनको पेट की गंभीर बीमारी थी | वे ठीक से बैठ भी नहीं पाते थे |

गांधीजी अपनी देख रेख में रखकर उनके भोजन और औषधि का प्रबन्ध करते थे |

जब भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वो गिरफ्तार हुए थे ,तो गांधीजी ने ब्रिटिश हुकूमत से निवेदन किया था ,की सरदार को उनके साथ रखा जाये ,क्योंकि उनकी देख रेख वे कर रहे थे |

सरदार पटेल उच्च कोटि के राष्ट्रभक्त और योग्य प्रशासक थे | वे प्रधान मंत्री को अन्य मंत्रियों से श्रेष्ठ नहीं मानते थे | वे कहते थे सभी मंत्री समान होते हैं ,जिनमें प्रधान मंत्री प्रथम होता है |

वे इतने तेजस्वी थे की उनके मंत्रालय के निर्णयों में दखलंदाजी करना असंभव था । मुहम्मद अली जिन्ना ने यह प्रस्ताव किया था की गृहमंत्रालय उनकी पार्टी को दिया जाय |इस पर नेहरूजी का उत्तर था कि वह मंत्री परिषद् का त्याग पत्र दे देंगे किन्तु गृहमंत्रालय छोड़ने के लिए सरदार पटेल से नहीं कहेंगे |

सरदार पटेल की देशभक्ति की उनकी योग्य प्रशासन की ,देशी राजाओं के केंद्र में विलीनीकरण आदि की प्रशंसा अवश्य करना चाहिए | किन्तु राजनैतिक लाभ प्राप्त करने की दृष्टि से उनको प्रधान मंत्री पद से वंचित व्यक्ति के रूप में , प्रकारांतर से प्रधान मंत्री पद प्राप्ति के इच्छुक के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए |

ना प्रधान मंत्री पद की इच्छा सरदार पटेल की थी और ना नेहरूजी की | दोनों ही अपने पदों से महान और बड़े थे | दोनों में कार्य की दृष्टि से मतभेद होते थे ,किन्तु दोनों ही एक दूसरे का आदर करते थे | दोनों ही गांधीजी को अपना मार्गदर्शक और नेता मानते थे |

३० जनवरी १९४८ को अपनी शहादत के कुछ समय पूर्व गांधीजी ने पटेल से कहा था की तुम्हारा और नेहरूजी का मंत्रिमंडल में बना रहना देश हित के लिए जरूरी है |

२अक्टूबर १९५० को इंदौर में सरदार पटेल ने अपने भाषण में कहा था की नेहरूजी हमारे नेता हैं | हम जहाँ हैं, वहीं ठीक है |

15 दिसंबर 1950 को उनकी मृत्यु हो गई और हिंदुस्तान का यह लौह पुरूष दुनिया को अलविदा कह गया।

अनेकता में एकता के सिध्दांत पर अमल कर, सबके साथ मिलकर ही अपने अज़ीम मुल्क को विकसित देश और विश्व गुरु बनाया जा सकता है। यही सरदार पटेल भी चाहते थे। धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर नफरत फैला कर नहीं। यह बात आज सत्तारूढ़ दल, उसके नेता, समर्थकों और उसकी विचार धारा के अन्य स्वयं भू, सुघोषित राष्ट्रवादी नेताओं और संगठनों को अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए।

धर्म निरपेक्ष (सेकुलर) सरदार पटेल को सच्ची श्रृद्धांजलि यही होगी कि हम नफरत और धार्मिक धुर्वीकरण की राजनीति का पूर्ण बहिष्कार करें। क्योंकि यह देश की एकता और अखंडता को कमज़ोर कर समाज में नफरत के बीज बो रही है। इसके परिणाम देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए बहुत ख़तरनाक हो सकते हैं।

सरदार पटेल को हज़ारों सलाम।

जयहिंद।

सैयद शहनशाह हैदर आब्दी

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