छ: दिसंबर 1992 शौर्य दिवस, काला दिन या अयोध्या में एक तहज़ीब के मर जाने की कहानी?,लेखक- सैयद शहनशाह हैदर आबदी

बाबरी मस्जिद विध्वंस – 27 वीं बर्सी।

छ: दिसंबर 1992 शौर्य दिवस, काला दिन या अयोध्या में एक तहज़ीब के मर जाने की कहानी?

पिछले सत्तर साल से सच तो बस बाबर को और उसकी बनवाई बाबरी मस्जिद बताकर लगातार झूठ बोला जाता रहा और एक समुदाय को गुमराह कर दूसरे सम्प्रदाय के लिये ज़हर घोला जाता रहा।

भला हो सर्वोच्चतम न्यायालय का जिसने दूध का दूध, पानी का पानी कर दिया।

राम मंदिर बनाने के लिये आस्था के आधार पर भले ही सरकारी ज़मीन उसी स्थान पर दे दी हो। लेकिन यह भी साफ किया :-

1- वहां कोई मंदिर तोड़कर मस्जिद नहीं बनाई गई।

2- 22 दिसम्बर 1949 को मस्जिद में मूर्तियों को ज़बरदस्ती रखकर मुसलमानों को वहां जाने से रोका गया और मस्जिद को मस्जिद सिध्द करने के लिये कहा गया।

3- 06 दिसम्बर 1992 को एक मस्जिद को सत्ता के संरक्षण में जानबूझकर तोड़कर देश के संविधान, क़ानून व्यवस्था, आपसी भाईचारे को तोड़ने का सघन अपराध किया।

राम मंदिर वहीं बने, हमें कोई ऐतराज़ नहीं। लेकिन केन्द्र और प्रदेश सरकार अगर ईमानदार है तो सर्वोच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित अपराधों के अपराधियों पर शीघ्र कठोर क़ानूनी करे। तब जाकर अयोध्या विवाद का सही इंसाफ होगा। इन लोगों ने लगातार झूठ बोलकर देश, समाज और दुनिया को गुमराह कर इनका माहौल ख़राब किया है, क़ानून व्यवस्था और संविधान का अपमान किया है।

एक आम इंसाफ और अमन पसंद हिन्दुस्तानी की हैसियत से जब इस सवाल का जवाब ढूँढने की कोशिश करता हूँ तो कुछ और सवाल ज़ेहन में उठते हैं, जैसे:

1- हमारी जानकारी के अनुसार गोस्वामी तुलसीदास जी ने महाराजा अकबर के काल में राम चरित्र मानस (रामायण) की रचना की। उनके इस पुनीत कार्य में बादशाह द्वारा विघ्न डाले जाने का कहीं कोई तज़किरा नहीं मिलता। आज देश में तुलसीदास जी की रामायण ही ज्यादा लोकप्रिय है।

2- अब तो तुलसी भी गलत लगने लगे हैं जो 1528 के आसपास ही जन्मे थे। लोग कहते हैं कि 1528 में ही बाबर ने राम मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनवाई। तुलसी ने तो देखा या सुना होगा उस बात को? बाबर राम के जन्म स्थल को तोड़ रहा था और तुलसी लिख रहे थे “मांग के खाइबो मसीत (मस्जिद) में सोइबो”। और फिर उन्होंने रामायण लिखा डाली। राम मंदिर के टूटने का और बाबरी मस्जिद बनने का क्या तुलसी को जरा भी अफसोस न रहा होगा? मर्यादा पुरुषोत्तम राम के जीवन की हर छोटी बड़ी घटना को लिपिबध्द करने वाले तुलसी दास जी ने रामायण में रामजन्म भूमि पर आक्रमण(?) की इतनी बड़ी घटना को लिपिबध्द क्यों नहीं किया?

3- क्या अयोध्या सिर्फ हमारे हिन्दु भाईयों के लिये ही आस्था का केन्द्र है? मुसलमानों के लिये “हज़रत शीश पैगम्बर की समाधि” के कारण आस्था केन्द्र नहीं ?

4- कहते हैं अयोध्या में राम जन्मे, वहीं खेले कूदे बड़े हुए। बनवास भेजे गए। लौट कर आए तो वहां राज भी किया। उनकी जिंदगी के हर पल को याद करने के लिए एक मंदिर बनाया गया। जहां खेले, वहां गुलेला मंदिर है। जहां पढ़ाई की वहां वशिष्ठ मंदिर हैं। जहां बैठकर राज किया वहां मंदिर है। जहां खाना खाया वहां सीता रसोई है। जहां भरत रहे वहां मंदिर है। हनुमान मंदिर है। कोप भवन है। सुमित्रा मंदिर है। दशरथ भवन है। ऐसे बीसीयों मंदिर हैं और इन सबकी उम्र 400-500 साल है। यानी ये मंदिर तब बने जब हिंदुस्तान पर मुगल या मुसलमानों का राज रहा। अजीब है न! कैसे बनने दिए होंगे मुसलमानों ने ये मंदिर! उन्हें तो मंदिर तोड़ने के लिए याद किया जाता है? उनके रहते एक पूरा शहर मंदिरों में तब्दील होता रहा और उन्होंने कुछ नहीं किया। कैसे अताताई थे वे, जो मंदिरों के लिए जमीन दे रहे थे?

5- शायद वे लोग झूठे होंगे जो बताते हैं कि जहां गुलेला मंदिर बनना था उसके लिए जमीन मुसलमान शासकों ने ही दी? दिगंबर अखाड़े में रखा वह दस्तावेज भी गलत ही होगा जिसमें लिखा है कि मुसलमान राजाओं ने मंदिरों के बनाने के लिए 500 बीघा जमीन दी? निर्मोही अखाड़े के लिए नवाब सिराजुदौला के जमीन देने की बात भी सच नहीं ही होगी?

6- अयोध्या में सच और झूठ अपने मायने खो चुके होते, अगर सर्वोच्चतम न्यायालय ने समझदारी भरा फैसला न दिया होता। मुसलमान पांच पीढ़ी से वहां फूलों की खेती कर रहे हैं। उनके फूल सब मंदिरों पर उनमें बसे देवताओं पर, राम पर चढ़ते रहे। मुसलमान वहां खड़ाऊं बनाने के पेशे में जाने कब से हैं। ऋषि मुनि, संन्यासी, राम भक्त सब मुसलमानों की बनाई खड़ाऊं पहनते रहे। सुंदर भवन मंदिर का सारा प्रबंध चार दशक तक एक मुसलमान के हाथों में रहा। 1949 में इसकी कमान संभालने वाले मुन्नू मियां 23 दिसंबर 1992 तक इसके मैनेजर रहे। जब कभी लोग कम होते और आरती के वक्त मुन्नू मियां खुद खड़ताल बजाने खड़े हो जाते तब क्या वह सोचते होंगे कि अयोध्या का सच क्या है और झूठ क्या?

7- अग्रवालों के बनवाए एक मंदिर की हर ईंट पर 786 लिखा है। उसके लिए सारी ईंटें राजा हुसैन अली खां ने दीं. किसे सच मानें? क्या मंदिर बनवाने वाले वे अग्रवाल सनकी थे या दीवाना था वह हुसैन अली खां जो मंदिर के लिए ईंटें दे रहा था? इस मंदिर में दुआ के लिए उठने वाले हाथ हिंदू या मुसलमान किसके हों, पहचाना ही नहीं जाता। सब आते हैं। एक नंबर 786 ने इस मंदिर को सबका बना दिया।

8- शाश्वत सत्य है कि सुबूत मुजरिम मिटाता है, इस विवाद के सुबूत किसने और क्यों मिटाए?

9- देश के लोकतंत्र, संविधान, न्यायपालिका, कार्यपालिका आदि संस्थानों के साथ विश्वासघात किसने किया? इनकी धज्जियाँ उड़ाना “काला दिन” क्यों नहीं?

10- एक खस्ताहाल इमारत को शासन और प्रशासन के संरक्षण में ज़मींदोज़ कर देना,किस प्रकार के शौर्य की श्रेणी में आता है?

11- पिछले सत्ताइस वर्षों से तथाकथित रामज़ादों की करतूत के कारण ही मर्यादा पुरुषोत्तम राम तम्बू में विराजमान हैं और खराब तम्बू को बदलने का निर्णय भी न्यायालय द्वारा लिया जा रहा है। आस्था के नाम पर देश के संविधान, न्यायपालिका तथा अन्य संवैधानिक संस्थाओं को नकारने वालों की आस्था अब कहाँ चली गयी है?

12- राम जी की इस बदहाली के ज़िम्मेदार और सत्ता प्राप्त कर उनसे विश्वासघात करने वाले क्या हैं?

13- छह दिसंबर 1992 के बाद सरकार ने अयोध्या के ज्यादातर मंदिरों को अधिग्रहण में ले लिया। वहां ताले पड़ गए। आरती बंद हो गई। लोगों का आना जाना बंद हो गया। बंद दरवाजों के पीछे बैठे देवी देवता क्या कोसते नहीं होंगे, कभी उन्हें जो एक गुंबद पर चढ़कर राम को छू लेने की कोशिश कर रहे थे? सूने पड़े हनुमान मंदिर या सीता रसोई में उस खून की गंध नहीं आती होगी, जो राम के नाम पर अयोध्या और भारत में बहाया गया? अयोध्या एक शहर के मसले में बदल जाने की कहानी है. अयोध्या एक तहज़ीब के मर जाने की कहानी है।

14- प्यारे देश वासियो, राममन्दिर अयोध्या में नहीं तो कहाँ बनेगा? लेकिन “लत्ते को सांप” बनाकर देश और समाज के सामने जो गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए गये हैं, उनके सही उत्तर तो ढूँढने ही होंगे। तभी तथाकथित रामज़ादों और (ह)रामज़ादों का सही चेहरा सामने आयेगा। देशहित में (ह)रामज़ादों पर क़ानूनी कार्यवाही आवश्यक है और सरकारों को इनपर कार्यवाही कर देश के संविधान और क़ानून व्यवस्था की इज़्ज़त बहाल करनी चाहिए।

सत्य के साधक मर्यादा पुरुषोत्तम राम को दिल की गहराइयों से सलाम।

सैयद शहनशाह हैदर आबदी
समाजवादी चिंतक – झांसी

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