जालौन-बेसिक शिक्षा में व्यवस्थाओं के अभाव से जूझते शिक्षक एवं बच्चे, रिपोर्ट-अतुल पांडेय

जालौन। वर्तमान परिदृश्य में बेसिक शिक्षा पर सरकार का विशेष ध्यान है, लेकिन ऐसे में संसाधनों के अभाव में छात्र और शिक्षक दोनों ही संघर्ष रत हैं जहां एक ओर सरकार परिषदीय विद्यालयों को निजी कान्वेंट विद्यालयों के साथ प्रतिस्पर्धा जमा रही है,
वहीं संसाधनों के अभाव में संपन्न घर के बच्चे यहां तक कि खुद शिक्षक अपने बच्चों को विद्यालय में दाखिला कराने से बचते देखे गए हैं। जब इसके कारण की तह को टटोला गया तो देखा कि परिषदीय विद्यालयों में मात्र दो शिक्षण कक्ष एक बरामदा और कहीं कहीं एकल कक्ष पाए गए। कुल दो कक्षों में 1 से लेकर 5 तक की कक्षाओं में शिक्षण कार्य करवाया जाता है, शिक्षक बताते हैं कि हमारे पास कमरों के अभाव के कारण हम बच्चों को कक्षावार बिठाने में सक्षम नहीं हो पाते जिससे कक्षा 1 के साथ कक्षा 2 और 3 को बिठाना पड़ता है और कक्षा 4 और 5 को अलग दूसरे कक्षा में बिठाते हैं। जब हमने पूछा कि क्या इससे बच्चों की पढ़ाई पर असर नहीं पड़ता तो शिक्षक ने कहा बिल्कुल पड़ता है क्योंकि सभी कक्षाओं का निर्धारित कोर्स अलग है।

देखने में आया है कि अधिकांश विद्यालय जहां छात्र नामांकन की वृद्धि हुई है वहां पर ग्रामीण जनों ने शिक्षकों के प्रयास और शिक्षा की गुणवत्ता को प्राथमिकता पर बताया गया है।

इस पर भी शिक्षक को दोषी ठहराना आसान साबित होता है इसलिए अव्यवस्थाओं का ठीकरा शिक्षक पर फोड़ दिया जाता है। शहरी क्षेत्र के विद्यालयों के आस पास रहने वाले आम जनों से इस विषय पर चर्चा की गई कि आपका बच्चा प्राइवेट में क्यों पढ़ता है तो वह इसे अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ने लगे उनका कहना था कि मेरा बच्चा ज़मीन में बैठ के कैसे पढ़ सकता है, अभी सर्दियां आने वाली हैं ऐसे में सभी बच्चों को ज़मीन में सर्दी लगती है और विद्यालयों में फर्नीचर की कोई व्यवस्था सरकार द्वारा आज तक प्रदान नहीं की गई।

विद्यालयों में पौधा रोपण अभी कुछ समय पहले ही कराया गया है, लेकिन अधिकांश स्कूलों में चारदीवारी के अभाव में गाय बकरी के भोजन के काम आ गए।
इस सब पर चर्चा को लेकर शिक्षक नेता विपिन उपाध्याय से इस पर खास बात चीत की गई उन्होंने बताया कि विद्यालय में चपरासी का कोई पद सृजित नहीं किया गया। विद्यालय की साफ सफाई एल, फट्टी बिछाने और पौधों में पानी देने से लेकर पीरियड की घंटी बजाने तक का काम शिक्षक को स्वयं ही करना पड़ता है, और बीच बीच में सूचनाओं को भी एनपीआरसी और बीआरसी पहुंचाना पड़ता है।
कागजी कार्य पहले कुछ हद तक प्रधानाध्यापक द्वारा संपन्न कर दिया जाता था लेकिन कुछ समय पहले राज्य सरकार ने सवा लाख प्रधानाध्याकों के पद समाप्त कर दिए। जहां निजी विद्यालयों में हर कक्षा को एक अध्यापक होता है, एक प्रधानाध्यापक,एक चपरासी, एक लिपिक होता है वहीं परिषदीय विद्यालयों में 1 या 2 शिक्षक पूरा स्कूल चला रहे हैं। और गुणवत्ता भी दे रहे हैं।

जनता, छात्रों और शिक्षकों की इन्हीं समस्याओं को लेकर और परिषदीय विद्यालयों की उत्तम गुणवत्ता तथा लोगों को सरकारी स्कूलों के प्रति आकर्षित करने के संसाधनों की मांग को लेकर उत्तर प्रदेश शिक्षक महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष डॉ दिनेश चन्द्र शर्मा जी और संयोजक नेता शिक्षक दल ओम प्रकाश शर्मा जी(एमएलसी) के नेतृत्व में आगामी 10 अक्टूबर को प्रदेश का पूरा शिक्षक समाज 12 सूत्रीय मांगों को लेकर जनपद स्तर पर मशाल जुलूस निकाल रहा है अगर सरकार नहीं सुनती है तो आगामी 6 नवंबर को लखनऊ में रैली का आयोजन किया जा रहा है।
शिक्षक नेता विपिन ने बताया कि जनपद का शिक्षक तमाम संसाधनों की कमी के बावजूद अपने विद्यालयों में अच्छी शिक्षा और अच्छा माहौल बना रहे हैं लेकिन अगर निजी विद्यालयों से प्रतिस्पर्धा करनी है तो संसाधनों को भी जुटाना होगा। आशा है सरकार हमारी मांगों को समझेगी और विद्यालय आगामी समय में निजी विद्यालयों से कहीं गुना आगे निकल जाएंगे।

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