साहित्य पटल पर कोंच का नाम रोशन कर रही रौली, रिपोर्ट-नवीन कुशवाहा

-कनाडा की एक मैगजीन ने प्रकाशन के लिए स्वयं रौली की रचनाएं आमंत्रित की

कोंच(जालौन) प्रतिभा उम्र की मोहताज नहीं होती परन्तु प्रदर्शन की पूरक होती है उक्त कहावत कोंच की युवा प्रतिभा रौली मिश्रा पर एकदम सटीक बैठती प्रतीत होती है।
बताते चलें कि रौली निरन्तर अपनी कलम को चला अपनी अभिव्यक्तियों को शब्दों में उकेरने का काम कर रही थी लेकिन उचित मार्गदर्शन एवं मुकम्मल मंच के आभाव में रचनाएँ सिर्फ डायरियों में सिमट के ही रह जा रही थी। लेकिन वह निरन्तर प्रयासरत रही और हाल में ही कनाडा की एक पत्रिका के संपादक ने रौली को मेल भेजते हुए लिखा है कि तुम्हारी कविता बुढ़ापा किसी को न दे हिंदी की पत्रिका साहित्य सुधा में पढ़ी और हृदय प्रफुल्लित हो गया। बहुत सुंदर विचार है। मै भी एक वृद्ध व्यक्ति हूँ और कैनेडा से हिंदी चेतना नामक पत्रिका प्रकाशित करता हूँ यदि आप चाहे तो अपनी रचनाये, लघु कथा या अन्य कुछ विधा में स्वयं लिखित भेजें।

अंतराष्ट्रीय पत्रिका से लेखन के लिए ऑफर प्राप्त होने के बाद रौली मिश्रा इसका श्रेय लेखक एवं स्तम्भकार पारसमणि अग्रवाल को देते हुये कहती है कि मेरी रचनाएँ पहले डायरी तक ही सीमित थी लेकिन मेरे एक टीचर के माध्यम से पारस भइया से मिलने के बाद लेखन को एक नई ऊर्जा मिली और वह कई जगह छप भी रहा। रौली मिश्रा की इस सफलता पर बधाइयों का ताँता लगा है।

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